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हृदय विदारक हादसा : मुरादनगर श्मशान घाट के गैलरी की छत गिरने से 18 लोगों की मौत

Desk by Desk
03/01/2021
in Main Slider, राजनीति, राष्ट्रीय
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हृदय विदारक हादसा Heartbreak incident

हृदय विदारक हादसा

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सियाराम पांडेय ‘शांत’

किसी भी व्यक्ति का निधन उसके परिजनों, शुभचिंतकों और रिश्तेदारों के लिए किसी आघात से कम नहीं होता। पूरा परिवार शोकाकुल हो जाता है, लेकिन अगर उसका अंतिम संस्कार करने गए लोग किसी दुर्घटना का शिकार होकर मौत को प्राप्त हो जाएं तो यह दुख और बढ़ जाता है। देश और प्रदेश में पहले भी इस तरह की घटनाएं होती रही हैं।

उत्तर प्रदेश के मुरादनगर श्मशान घाट के गैलरी की छत गिरने से 18 लोगों की मौत हो गई और 24 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। बताया जा रहा है कि जिस गैलरी की छत ढही है, वह दस साल पुरानी है। इसका निर्माण नगरपालिका द्वारा कराया गया है। इन दिनों उसका निर्माण कार्य चल रहा था। सुबह बरसात होने की वजह से लाश जलाने गए लगभग 110 लोग गैलरी में खड़े थे। अचानक यह हादसा हो गया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस घटना पर न केवल दुख व्यक्त किया है बल्कि मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये की सहायता देने और घायलों के समुचित इलाज के भी अधिकारियों को निर्देश दिए हैं। उन्होंने मंडलायुक्त और एडीजी मेरठ जोन से घटना की रिपोर्ट देने को भी कहा है। राष्ट्रीय आपदा राहत और बचाव दल लिंटर के नीचे दबे लोगों को निकालने और उन्हें अस्पताल पहुंचाने में जुटा है। पुलिस और प्रशासन के आला अफसर भी मौके पर पहुंच गए हैं।

सवाल यह है कि जब इस गैलरी का निर्माण हो रहा है तो वहां पहली बात तो भीड़ जुटने ही नहीं देनी चाहिए थी। अगर लाश को अन्यत्र जलाने की व्यवस्था की जाती तो शायद यह दुर्घटना नहीं होती। दूसरा बड़ा सवाल नगर पालिका पर है कि उसने किस तरह की गैलरी बनाई जिसकी छत दस साल भी नहीं टिक सकी। वैसे भी किसी श्मशान में होने वाली यह पहली घटना नहीं है।

इससे पूर्व 18 अक्टूबर, 2020 को भी मेरठ जिले के इचौली थाना क्षेत्र स्थित एक श्मशान घाट में जलती चिता पर श्मशान का लिंटर गिर गया था। परिजनों को अधजली लाश को निकालकर दूसरी जगह जलाना पड़ा था। यह और बात है कि इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ था। मेरठ जोन में तीन माह के अंदर ही एक ही प्रकृति की दो धटनाओं का होना बेहद चिंताजनक बात है। इस पर गौर किए जाने की जरूरत है।श्मशानघाट को बेफिक्री की जगह माना जाता है जहां व्यक्ति संसार की नश्वरता का बोध प्राप्त करता है लेकिन जर्जर श्मशान घाट लोगों की परेशानी का तो सबब बन ही रहे हैं, लाशों की बेकद्री का भी कारण बन रहे हैं।

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सरकार को चाहिए कि वह इस तरह की घटनाओं से सबक ले और प्रदेश के सभी श्मशान घाटों की तहकीकात कराए कि वे कब बनाए गए और मौजूदा समय में उनकी हालत क्या है? वहां परिजन बेफिक्री के साथ लाश जला सकते हैं या नहीं? नगर पालिकाओं का व्यक्ति के जीवन और मरण से सीधा वास्ता होता है। श्मशान घाटों पर नगरपालिका की रसीद भी कटती है लेकिन इन सबके बाद भी नगरपालिका श्मशान घाटों पर सुविधाओं को लेकर जरा भी गंभीर नहीं होती। मुरादनगर में हुआ हादसा इसकी बानगी है।

कोविड-19 की मार को देखते हुए पूरे देश में सामाजिक दूरी बनाए रखने की बात की गई है। श्मशानघाटों पर लोगों के सीमित संख्या में जाने की व्यवस्था की गई है। शादी और अन्य सामाजिक आयोजनों में भी सीमित संखा बनाए रखने के प्रशासन के निर्देश नहीं है। इसके बावजूद मुरादनगर में श्मशानघाट में 110 लोग कैसे पहुंच गए, यह भी जांच का विषय है। पुलिस प्रशासन उस दौरान क्या करता रहा? जाहिरा तौर पर पुलिस -प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई अन्यथा इस हादसे में जनहानि कम होती। प्रशासन यह तर्क दे सकता है कि अंत्येष्टि के दौरान तो लोग परस्पर दूर-दूर रहते ही हैं, बरसात न होती तो लोग इतने करीब नहीं आते। उनके तर्क में दम है लेकिन असल सवाल तो यह है कि इतने लोग श्मशान घाट में पहुंचे कैसे? कमजोर छत बनाने के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

नगरपालिका और ठेकेदार की मिलीभगत को दरअसल कौन रोकेगा? किसी की मौत पर शासन द्वारा मुआवजा दिया जाना समस्या का हल नहीं है। पीड़ितों को राहत मिलनी चाहिए लेकिन अच्छा होता कि इन मुआवजों की राशि का भुगतान हादसों के लिए जिम्मेदार लोगों से ही वसूला जाता। गुणवत्ताविहीन निर्माण के लिए उन पर हादसे होने की स्थिति में हत्या के मुकदमे चलाए जाते। चूंकि सरकार इस तरह की कोई कार्रवाई नहीं करती, इसलिए भी भ्रष्टाचार परवान चढ़ता है और आम आदमी की जान अक्सर खतरे में पड़ती रहती है।

लाश जलाने गए लोग अक्सर दुर्घटना का शिकार होते रहते हैं। सड़क हादसों में कई बार अंतिम संस्कार करने वालों की जान गई है लेकिन श्मशान घाट ही गिर जाए तो प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल का उठना लाजिमी है। 18 लोगों की जान प्रशासन की गलती से गई है, इस बात को नकारा नहीं जा सकता। मुख्यमंत्री को इस बात की जांच करानी चाहिए कि कोविड नियमावली का जिलों में कितना अनुपालन हो पा रहा है। अगर हर जिले का प्रशासन अपने दायित्व को बखूबी निभा दे तो भी इस तरह के हादसों की बांबारता को रोका जा सकता है।

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निर्माण कार्यों में गुणवत्ता के साथ समझौता अब आम बात हो गई थी। भ्रष्टाचार इतना चरम पर पहुंच गया है कि अधिकारी ‘ अपना काम बनता-भाड़ में जाए जनता’ की मानसिकता के साथ काम करने लगे हैं। यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है और इस पर अविलंब रोक लगाई जानी चाहिए। राज्य सरकार को इस घटना की न केवल निष्पक्ष जांच करानी चाहिए बल्कि इस घटना के जिम्मेदारों को इतनी सख्त सजा देनी चाहिए कि भविष्य में निर्माण कार्य में गुणवत्ता से समझौता करने वालों को सौ बार सोचना पड़े। जिंदगी का महत्व तो समझना ही होगा।

नागरिक सुविधाओं की उपेक्षा असंतोष को जन्म देती है। श्मशानघाट, मंदिर , मस्जिद सार्वजनिक संपत्ति हैं। अगर वे जर्जर हो रहे हैं तो वहां नागरिकों का प्रवेश रोककर पहले उसका जीर्णोद्धार कराया जाना चाहिए। इसके बाद ही वहां लोगों का प्रवेश होने दिया जाना चाहिए। गाजियाबाद जिले में हुई यह घटना हृदय विदीर्ण करने वाली है। उसने कई घरों में मातम फैला दिया है। सरकार की इस घटना की गंभीरता को समझना चाहिए और इस हादसे के जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। जब भी इस तरह के हादसे होते हैं तो सरकार के क्रियाकलाप पर अंगुलियां उठती हैं।

विपक्षी दलों को भी सरकार को घेरने का मौका मिलता है। भवन कब बना था। पुल कब बना था,श्मशान घाट कब बना था, किसके कार्यकाल में बना था, यह सवाल गौण हो जाता है। अगर गुणवत्ता परखनी है तो आंग्लशासन काल में हुए निर्माण को देख लिया जाए। हाल के वर्षों में जितने भी निर्माण हो रहे हैं, उनकी गुणवत्ता पर आए दिन सवाल उठते रहे हैं। विकास प्राधिकरणों और आवास विकास परिषद के निर्माण की आवंटी निरंतर शिकायत करते रहते हैं।

प्रापर्टी डीलरों द्वारा कराए गए कई निर्माण गाजियाबाद में ध्वस्त हो चुके हैं ,लेकिन उन पर कार्रवाई के नाम पर महज लीपापोती ही हुई। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह कहा करते थे कि सत्ता की अपनी धाक होती है। इस धाक से अधिकारी डरते हैं। योगी सरकार को इस बात को समझना चाहिए कि धाक क्षमा करने से नहीं, कार्रवाई करने से बनती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि श्मशान हादसे के दोषी बख्शे नहीं जाएंगे।

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