नई दिल्ली: भारत में मौत की सजा देने के तरीके को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल स्थिति साफ कर दी है। फांसी की जगह लीथल इंजेक्शन जैसे विकल्प अपनाने की मांग वाली जनहित याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था के तहत फांसी से मृत्युदंड देना संवैधानिक रूप से वैध है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने ‘दीना बनाम भारत संघ’ से जुड़े पुराने फैसलों को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग भी स्वीकार नहीं की।
‘फांसी क्रूर और अमानवीय’ होने का तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा ने दलील दी कि फांसी का तरीका कैदी को अत्यधिक पीड़ा दे सकता है। याचिका में BNSS की धारा 393(5) की संवैधानिकता पर भी सवाल उठाया गया।
याचिका में कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार के साथ गरिमा का तत्व भी शामिल है। इसी आधार पर मृत्युदंड को कम पीड़ा वाले तरीके से लागू करने की मांग की गई।
लीथल इंजेक्शन पर भी उठे सवाल
याचिका में गोली, जहरीले इंजेक्शन, इलेक्ट्रोक्यूशन और गैस चैंबर जैसे विकल्पों का उल्लेख किया गया था। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का हवाला देते हुए न्यूनतम पीड़ा वाले तरीके को अपनाने की बात भी कही गई।
हालांकि, केंद्र की ओर से लीथल इंजेक्शन को लेकर व्यावहारिक कठिनाइयों का जिक्र किया गया। अमेरिका में इस तरीके के दौरान सामने आई कुछ विफल घटनाओं का भी उल्लेख सुनवाई में हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने छोड़ी भविष्य की गुंजाइश
अदालत ने अपने फैसले में एक अहम बात कही। याचिका खारिज करने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में इस मुद्दे पर दोबारा विचार नहीं हो सकता।
यदि नए वैज्ञानिक, मेडिकल या व्यावहारिक प्रमाण सामने आते हैं, तो मृत्युदंड देने के तरीके की संवैधानिक समीक्षा संभव होगी। केंद्र सरकार चाहे तो विशेषज्ञों की समिति बनाकर फांसी के विकल्पों पर विस्तृत अध्ययन भी करा सकती है।
यानी फिलहाल फांसी की व्यवस्था कायम रहेगी, लेकिन आने वाले समय में विज्ञान और मेडिकल रिसर्च अगर कोई नया ठोस विकल्प सामने लाते हैं, तो इस बहस का दरवाजा फिर खुल सकता है।









