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लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति बनाने वाले कुम्हार को नहीं मिलता मां लक्ष्मी का आशीर्वाद

Writer D by Writer D
13/11/2020
in Main Slider, उत्तर प्रदेश, ख़ास खबर, प्रयागराज
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कुम्हार

कुम्हार

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दीपावली पर्व पर दूसरों के घरों में ज्ञान का दीपक और समृद्धी का प्रकाश फैलाने वाले कुम्हारों की विडम्बना है कि उनके घर अज्ञानता और विपन्नता का अंधेरा सदियों से कायम है।

दीपावली पर हर व्यक्ति अपने घर लक्ष्मी आगमन की कामना करता है। दीपावली वह मौका होता है जब दीपकों की रौशनी में लोग मां लक्ष्मी और गणेश का पूजन कर उनसे सुख-समृद्धि की कामना करते हैं, लेकिन दिवाली पर जलने वाले दियों से लेकर लक्ष्मी गणेश की मूर्तियों को बनाने वाले कुम्हारों के यहां लक्ष्मी का आशीर्वाद नहीं मिलता, उनके घर विन्नता और अंधेरा ही कायम रहता है।

कुम्हारों का कहना है कि कुम्हार की चाक मिट्टी आज अपना ही वजूद तलाश रही है। कड़ी मेहनत से मिट्टी के दीपक, खिलौना और बर्तन बनाने वालो को खरीददार के लिए भी रोना पड़ रहा है। एक दौर था जब कुम्हार दीपावली का बेसव्री से इन्तजार करते थे। उस समय मिट्टी के दीपकों की बहुत मांग थी और बाजारों में खरीददारों की बड़ी भीड़ हुआ करती थी। पहले जिन गांवो में कुम्हारों की भरमार होती थी वहां भी अब बहुत कम कुम्हार रह गये हैं।

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दीपाें के पर्व दीपावली और मिट्टी के दियों का चोली दामन का साथ है। कुम्हारों के दीपक से दमकती दीपावली चाइनीज सस्ती झालरों ने उनके आर्थिक स्रोत पर नाग की तरह कुंडली मारकर बैठ गया है। दीपावली से दो-तीन महीने पहले जिन कुम्हारों को दम भरने की फुरसत नहींं मिलती थी, वहीं अब धीमी चाक पर कुम्हारों की जिंदगी रेंगती नजर आ रही है। उनका कहना है कि पहले व्यवसाय चाइनीज झालरों के कारण ठप्प हो गया था अब चाइनीज महामारी कोविड़-19 ने पूरी दुनिया को अपने चंगुल में दबोच रखा है। भले ही लॉकडाउन खुल गया है लेकिन बाजार में खरीददारों के अभाव के बाद उनका धंधा पूरी तरह चौपट हो गया है।

बदलते चलन के साथ मिट्टी के दीए की कहानी ख़त्म होती जा रही है। पुश्तों से यही काम करने वाले कुम्हार आज दीवाली के पहले उदास और मायूस दिखते हैं। शहर के बलुआघाट, कीड़गंज, मुंडेरा, तेलियरगंज, फाफामऊ जैसे शहर के अन्य क्षेत्रों में फैले करीब 800 परिवार हैं। पहले इनकी संख्या 1500 से करीब थी लेकिन रोजी रोटी के लिए बड़ी संख्या वाले परिवारों ने अपने पैतृक व्यवसाय से तौबा कर लिया।

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तेलियरगंज निवासी हरखु राम प्रजापति ने बताया कि कुम्हारों में शिक्षा का घोर अभाव है। शिक्षित नहीं होने के कारण ये अपने हक की बात भी आगे नहीं बढ़ा पाते। बच्चों की शिक्षा को लेकर अधिकांश कुम्हारों ने अपनी पीडा व्यक्त करते हुए कहा कि पहले हम परिवार का पेट भरें या स्कूल की व्यवस्था करें। पुरानी कहावत बन गयी है कि विद्यालय शिक्षा का मन्दिर होता है, अब यह कहावत बन कर पन्नों में दब कर रह गया है। शिक्षा कितनी आसान है। किसी से छिपी नहीं है। अब शिक्षा का व्यवसायी करण हो गया है। शिक्षा गरीब के बच्चों के लिए आसान नहीं रह गयी।

फाफामऊ, तेलियरगंज और कीडगंज निवासी हरिया प्रजापति, विदेशी और ररई प्रजापति का कहना है कि वह बड़ी मेहनत करके मिट्टी के बरतन गुल्लक और दीये आदि बनाते हैं। मिट्टी और अन्य सामानों के मूल्यों में इजाफा होने के कारण उपभोक़्ताओं से उन्हें उनके परिश्रम का उचित लाभ भी नहीं मिल पाता है। आधुनिकता की दौड़ में लोग कुम्हारों द्वारा बनाए गए मिट्टी के सामानों को खरीदने को प्राथमिकता नहीं देते जिसके कारण परिवार में विपन्नता हमेशा विद्यमान रहती है।

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फाफामऊ निवासी हरिया का कहना है कि आलीशान बंगलों पर सजी चाइनीज लड़ियां बेशक लोगों के मन को लुभाती हों, लेकिन इन बंगलों के नीचे भारतीय परंपरा को निभाते आ रहे कुंभकारों की माटी दबी पड़ी है। ढाई से

तीन हजार रुपए में चिकनी मिट्टी ट्राली खरीदकर दिए बनाकर कुम्हार मुनाफा नहीं कमा रहा, बल्कि अपनी संस्कृति, रीति.रिवाज को जीवंत रखने का प्रयास कर रहा है। आज से 10-15 पंद्रह वर्ष पहले जहां कुम्हारों को आस.पास की जगह से ही दिए बनाने के लिए चिकनी मिट्टी आसानी से फ्री में उपलब्ध हो जाती थी, वहीं अब इस मिट्टी की मोटी कीमत चुकानी पड़ती है। वहीं इस मिट्टी से तैयार एक-दो रुपए के दीपक को खरीदते समय लोग मोल.भाव भी करना नहीं भूलते।

ररई का कहना है कि समय के साथ चिकनी मिट्टी के स्त्रोत एवं जगहों के समाप्त होने के साथ कुम्हारों को चिकनी मिट्टी मोल लेनी पड़ रही है। 15 साल पहले जहां 10 पैसे के दीपक में कुम्हार को अच्छी बचत हो जाती थी, वहीं आज एक दीपक 2 से 5 रुपए में बेचने पर भी कुम्हार रत्तीभर मुनाफा नहीं कमा पाता है। कुछ कुम्हारों को अच्छे आर्डर मिलने से सभी की दीवाली अच्छी नहीं मनती। पहले की तरह सभी कुम्हारों का कारोबार अच्छा होने से अच्छा माना जाता है।

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उन्होने कहा कि दीपावली में रंग-बिरंगे चायनीज झालरों के बीच रोशनी के इस पर्व पर लोग मिट्टी के दीपक खरीदना चाहिए ताकि कुम्हारों की दीपावली और घर भी रोशन हो सके। पहले करवाचौथ एवं बाद में मिट्टी के दीपक बनाने का काम बड़े पैमाने पर चलता था। कुम्हारों को इस सीजन में पल भर के लिए बैठने की फुर्सत नहीं मिलती थी लेकिन बीते कुछ वर्षो में सस्ती चायनीज झालरों ने मिट्टी के दीपकों की जगह ले ली। इसके चलते लोग महज शगुन और पूजन के लिए मिट्टी के दीपक की खरीद करने लगे।

तेलियरगंज निवासी कहा कि दीवाली में पारंपरिक तौर पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले मिट्टी के दीए अब सिमट कर शगुन के तौर पर इस्तेमाल होने लगे हैं। पहले कुम्हारों को दीवाली जैसे त्योहारों का बेसब्री से इन्तजार रहता था। दीयों की मांग पूरी करने के लिए तैयारी महीनों पहले से तैयारी शुरू कर देते थे। लगातार बढ़ती मंहगाई और लोगों की बदली रुचि से अब तस्वीर बदल गई है। परम्परागत दियों की जगह अब आधुनिक लड़ियों ने भले ले ली है लेकिन असली दीवाली तो मिट्टी के दियो से मनाई जाती है।

कीड़गंज निवासी दीपक बनाने वाले अहिरवर प्रजापति ने बताया कि वे मिट्टी के बर्तन, दीपक, घड़े बनाने का काम केवल उनकी सभ्यता एवं संस्कृति के लिहाज से करते हैं, अन्यथा इससे उन्हें कोई मुनाफा नहीं है। महंगी मिट्टी खरीदकर काम शुरू करना। एक तिहाई मिट्टी का खराब हो जाना और फिर दीपक तैयार करने के बाद भट्टी में औसतन 100 में 5 दीपकों का खराब हो जाना निश्चित है। ऐसे में कुम्हार मुनाफा कैसे कमा सकता है। यह तो केवल श्रद्धा है भारतीय संस्कृति के प्रति।

महंगाई की मार से कुम्हार ही नहीं, आम लोग भी प्रभावित हुए हैं। पहले लोग 100 से 400 दिवली खरीदते थे और उनमें सरसों तेल डाल कर चारों ओर सजाते थे लेकिन आज सरसों तेल की कीमतें बढ़ने के बाद अब लोग केवल शगुन के लिए 11 और 21 दीपक खरीद कर केवल शगुन मना रहे। उन्होने बताया कि पिछले पचास साल से दीए बना रहा हूँ, साथ.साथ कुल्हड़, प्याला, हड़िया आदि जो बिक जाए, वो बनाता हूँ नहीं बिकता तो ढेर लगा रहता है।

उन्होने कहा कि दीपो की मांग कम जरूर हुई है पर धार्मिक महत्व पर असर नहीं डाल पायी है। उन्होने बताया कि हर साल दीवाली के मौके पर नए डिजाइन की सस्ती और आकर्षक झालरों की वजह से लोगों में इनकी मांग अधिक होने से पारंपरिक दीए की रोशनी टिमटिमाने लगी है और इनको बनाने वाले कुम्हारों की जिंदगी में अंधेरा पसरने लगा है।

अहिरवर ने कहा कि मिट्टी का दिया मिट्टी से बने मनुष्य शरीर का प्रतीक है। उसमें रहने वाला तेल उसकी जीवन शैली का प्रतीक है। दीपक हमें अंधकार दूर कर समाज में प्रकाश फैलाने की सीख देता है। दीपक की लौ केवल रोशनी की प्रतीक नहीं है बल्कि वह अज्ञानता से अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश से जीवन को रोशन करने की प्रेरणा देता है।

उन्होने कहा यह विण्डबना नहीं तो और क्या है कि दीपावली के अवसर पर दूसरों के घर ज्ञान का दीपक और समृद्धी का प्रकाश फैलाने वाले कुम्हारों के घर अज्ञानता और विपन्नता का अंधेरा कायम रहता है।

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