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कोरोना काल में प्रीमेच्योर शिशुओं के पैदा होने के मामले घटे

Desk by Desk
23/07/2020
in Main Slider, फैशन/शैली, राष्ट्रीय
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प्रीमेच्योर शिशु

प्रीमेच्योर शिशु

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लाइफ़स्टाइल डेस्क। कोरोना काल में दुनिया के ज्यादातर देशों में अस्पतालों के इमरजेंसी से लेकर जनरल वॉर्ड तक मरीजों से पटे पड़े हैं। हालांकि, लगभग सभी मुल्कों में नवजात गहन चिकित्सा विभाग (एनआईसीयू) में मेडिकल हलचल काफी हद तक घट गई है। प्रीमेच्योर डिलीवरी (तय समय से पहले प्रसव) की दर में भारी कमी इसकी मुख्य वजह है। यूनिवर्सिटी मैटर्निटी हॉस्पिटल लिमरिक (आयरलैंड) और स्टेटन्स सीरम इंस्टीट्यूट (डेनमार्क) के हालिया अध्ययन बात सामने आई है।

75% कम प्रीमेच्योर बच्चे पैदा हुआ-

शोधकर्ताओं ने पाया कि साल 2019 के मुकाबले 2020 में जून माह तक दुनियाभर में लगभग 75 फीसदी कम प्रीमेच्योर बच्चे पैदा हुए। डेनमार्क, नीदरलैंड, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में समय से पहले प्रसव के मामलों में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई।

कम वजन की शिकायत में भी कमी-

दोनों अध्ययन में यह भी देखा गया कि ज्यादातर देशों में ऐसे शिशुओं के जन्म में भारी कमी आई है, जिनका वजन 3.3 पौंड (लगभग 1.49 किलोग्राम) या उससे कम हो। ऐसे शिशुओं का शारीरिक विकास सुनिश्चित करने के लिए उन्हें इंक्यूबेटर में रखने की जरूरत पड़ती है।

महामारी में डिप्रेशन से जूझ रहीं मांएं-

इससे पहले, ‘जर्नल फ्रंटियर्स इन ग्लोबल वीमेंस हेल्थ’ में प्रकाशित एक शोध में दावा किया था कि महामारी के दौरान मां बनी महिलाओं के बेचैनी और डिप्रेशन के शिकार होने का खतरा तीन गुना ज्यादा होता है। शिशु को संक्रमण से बचाने का तनाव और उसके भविष्य को लेकर मन में तरह-तरह की आशंकाएं इसका मुख्य कारण हैं।

कहां कितनी कमी-

आयरलैंड-
  • 8.8 प्रति एक हजार के करीब रही प्रीमेच्योर शिशुओं की जन्म दर जनवरी 2001 से अप्रैल 2019 के बीच
  • 2.17 ही समय से पहले प्रसव के मामले सामने आए प्रति एक हजार पर जनवरी से अप्रैल 2020 के दौरान
डेनमार्क-
  • 2.19 औसतन प्रीमेच्योर शिशु पैदा हुए थे डेनमार्क में बीते पांच वर्षों के दौरान प्रति एक हजार पर
  • 90 फीसदी कमी देखी गई वक्त से पहले जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या में लॉकडाउन के दौरान

इन तीन वजहों से आई गिरावट-

1.शुद्ध आबोहवा-

लॉकडाउन के चलते लोग घरों में रहे, जिससे वायु प्रदूषण के स्तर में भारी कमी आई। विभिन्न अध्ययनों में प्रीमैच्योर प्रसव के 18% मामलों के लिए दूषित आबोहवा को जिम्मेदार ठहराया गया है।

2.तनावमुक्त जीवन-

घर में कैद रहने की मजबूरी ने भले ही तनाव को जन्म दिया हो, पर यह ऑफिस का लंबा सफर तय करने और कार्यस्थल पर महसूस किए जाने वाले दबाव के दौरान होने वाली झुंझलाहट से कम घातक है।

3.अस्पताल जाने में हिचकिचाहट-

मैच्योर प्रसव के मामले इसलिए भी घटे क्योंकि कोरोना संक्रमण की जद में आने के डर से महिलाएं अस्पताल कम गईं। इस कारण उच्च रक्चताप सहित अन्य समस्याओं के चलते वक्त से पहले प्रसव नहीं करवाना पड़ा।

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