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मोहिनी एकादशी: इस व्रत से मिलता है सहस्‍त्र गोदान का फल, जानें पूजा विधि

Writer D by Writer D
22/05/2021
in Main Slider, धर्म, फैशन/शैली
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Devuthani Ekadashi

Devuthani Ekadashi

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एकादशी के सभी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। इसीलिए इन व्रतों को सभी प्रकार के व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है। लेकिन मोहिनी एकादशी को पुराणों में विशेष स्‍थान दिया गया है। मान्‍यता है कि जो भी जातक यह व्रत करता है उसे सहस्‍त्र गोदान का फल मिलता है। इस बार यह व्रत 22 मई को है। आइए व्रत कथा, पूजा व‍िध‍ि के साथ जानते हैं इस एकादशी का महत्‍व क्‍या है?

पाप से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति

मोहिनी एकादशी का व्रत व्यक्ति को पाप से भी मुक्ति दिलाता है। अंजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है। इस व्रत के दिन दान का भी महत्व है। भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद जरुरतमंंदों को भोजन कराने से भगवान प्रसन्न होते हैं। साथ ही इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

भगवान विष्णु क्यों लेना पड़ा मोहिनी का स्वरूप

एक पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन की प्रक्रिया चल रही है। मंथन से जब अमृत कलश निकला तो उसे असुरों ने ले लिया। इससे देवताओं और असुरों के बीच तनाव और विवाद की स्थिति पैदा हो गई। इस स्थिति को देखते हुए तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धरा और असुरों के बीच पहुंच गए। भगवान विष्णु के मोहिनी रूप पर असुरा मोहित हो उठे और अमृत कलश उनके हाथों में सौंप दिया। जिसे बाद में भगवान विष्णु ने सभी देवताओं को पिता दिया। जिससे देवतागण अमर हो गए।

व्रत की विधि

एकादशी का व्रत दशमी तिथि से ही आरंभ करना चाहिए। इस दिन से सूर्य अस्त के बाद से भोजन नहीं करना चाहिए। एकादशी की तिथि के दिन सुबह स्नान करने के बाद पूजा करनी चाहिए।

मोहिनी एकादशी की व्रत कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब समुद्र मंथन के दौरान जब अमृतकलश निकला तो देवताओं और असुरों में अमृत के बंटवारे को लेकर छीनाझपटी मच गई। असुर देवताओं को अमृत नहीं देना चाहते थे जिस वजह से भगवान विष्णु ने एक बहुत रूपवती स्त्री मोहिनी का रूप धारण किया और असुरों को रिझा कर उनसे अमृतकलश लेकर देवताओं को अमृत बांट दिया। इसके बाद से सारे देवता अमर हो गए। यह घटनाक्रम वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को हुआ इसलिए इसे मोहिनी एकादशी कहा गया।

मोहिनी एकादशी की व्रत कथा 2

पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नामक एक नगर था। जहां पर एक धनपाल नाम का वैश्य रहता था, जो धन-धान्य से परिपूर्ण था। वह सदा पुण्य कर्म में ही लगा रहता था। उसके पांच पुत्र थे। इनमें सबसे छोटा धृष्टबुद्धि था। वह पाप कर्मों में अपने पिता का धन लुटाता रहता था। एक दिन वह नगर वधू के गले में बांह डाले चौराहे पर घूमता देखा गया। इससे नाराज होकर पिता ने उसे घर से निकाल दिया तथा बंधु-बांधवों ने भी उसका साथ छोड़ दिया।

वह दिन-रात दु:ख और शोक में डूब कर इधर-उधर भटकने लगा। एक दिन वह किसी पुण्य के प्रभाव से महर्षि कौण्डिल्य के आश्रम पर जा पहुंचा। वैशाख का महीना था। कौण्डिल्य गंगा में स्नान करके आए थे। धृष्टबुद्धि शोक के भार से पीड़ित हो मुनिवर कौण्डिल्य के पास गया और हाथ जोड़कर बोला, ब्राह्मण ! द्विजश्रेष्ठ ! मुझ पर दया कीजिए और कोई ऐसा व्रत बताइए जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो।’

तब ऋषि कौण्डिल्य ने बताया कि वैशाख मास के शुक्लपक्ष में मोहिनी नाम से प्रसिद्ध एकादशी का व्रत करो। इस व्रत के पुण्य से कई जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। धृष्टबुद्धि ने ऋषि की बताई विधि के अनुसार व्रत किया। जिससे वह निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ

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