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हमेशा याद आएंगे भगवान रामभक्त कल्याण

Writer D by Writer D
21/08/2021
in Main Slider, उत्तर प्रदेश, राजनीति, लखनऊ
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सियाराम पांडेय ‘शांत’

कल्याण सिंह जैसा राम भक्त नेता भाजपा में कोई नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के वे एकमात्र नेता हैं जिसने राम मंदिर के लिए न केवल अपनी सत्ता कुर्बान की बल्कि एक दिन की सजा भी काटी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कल्याण सिंह की अहमियत एक प्रकाश स्तंभ की है। वह न होते तो भाजपा का आज उत्तर प्रदेश में जो विशाल स्वरूप दिखाई दे रहा है, कदाचित वह न नजर न आता। लालकृष्ण आडवाणी ने अगर भाजपा को देशव्यापी बनाने का काम किया तो उत्तर प्रदेश में भाजपा की जड़ों को मजबूत करने वाले कल्याण सिंह ही थे।

अपने राजनीतिक भविष्य की बलि देकर भी 6 दिसंबर,1992 को उन्होंने  राम मंदिर के लिए जो कुछ भी किया, उसे  सपने में भी कोई सोच नहीं सकता ।

उन्होंने एक लाइन का आदेश दिया था कि वे अयोध्या में कारसेवकों पर गोली नहीं चलवाएंगे। बाबरी ढांचा विध्वंस के बाद उन्होंने एक लाइन का इस्तीफा दिया था और एक दिन की सजा भी काटी थी। उन्होंने 6 दिसम्बर,1992 को राष्ट्रीय गौरव का दिन बताया और वर्ष 1528 को ‘काला वर्ष’ कहा क्योंकि उसी वर्ष राम मंदिर को तोड़कर उसकी जगह बाबरी ढांचे का निर्माण हुआ था। लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में जब बाबरी मस्जिद की शहादत को पूर्व साजिश,भाजपा नेतृत्व की सत्ता लोलुपता बताया गया तब कल्याण सिंह भाजपा के पहले नेता थे जिसने इसका प्रबल प्रतिवाद किया और पूरी रिपोर्ट को खारिज करते हुए उसे राजनीति से प्रेरित करार दिया।

पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का निधन, कार्यकर्ताओं में दौड़ी शोक की लहर

यह सच है कि ढांचा गिराए जाने के समय वे अयोध्या में नहीं थे, फिर भी उन पर साजिश में शामिल होने का आरोप लगा। 6 दिसंबर की शाम को ही घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। बाद में केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश विधानसभा भंग कर दी थी। घटना के बाद कल्याण सिंह ने  कहा था कि  ‘कोर्ट में केस करना है तो मेरे खिलाफ करो, जांच आयोग बैठाना है तो मेरे खिलाफ बैठाओ। किसी को दंड देना है तो मुझे दो। मतलब कल्याण खुद मामले को अपने सिर पर लेकर कारसेवकों और प्रमुख भाजपा नेताओं को विधिक कार्रवाई से बचाना चाहते थे। यह भी अपने आप में जिगर की बात है। आज जब नेता जवाबदेही से भागते हैं, गलतियों का ठीकरा दूसरों पर फोड़ना चाहते हैं, ऐसे में कल्याण सिंह का व्यक्तित्व और कृतित्व राह भी दिखाता है और सच को स्वीकार करने का संबल भी देता है। वर्ष 1997 में दोबारा अपनी सरकार बनने के बाद फरवरी 1998 में उन्होंने  बाबरी मस्जिद विध्वंस में शामिल लोगों के खिलाफ सभी आरोप वापस ले लिए थे। इससे उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता और वैचारिक दृढ़ता का पता चलता है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 90 का दशक बेहद महत्व रखता है। उन दिनों यहां दो विचारधाराएं सक्रिय थीं। एक विचारधारा अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता की पक्षधर थी और इसके लिए उसने कारसेवकों पर गोली तक चलवा दी थी और दूसरी विचारधारा ‘ रामलला हम आएंगे—मंदिर वहीं बनाएंगे’वाली थी। कहना न होगा कि कल्याण सिंह मानसिक और भावनात्मक स्तर पर दूसरी विचारधारा के साथ खड़े थे। मुख्यमंत्री रहते उन पर अपने कर्तव्य का निर्वहन न करने और उग्र कारसेवकों को न रोकने का आरोप लगा जिसे उन्होंने नीलकंठ भगवान शिव की तरह सहर्ष स्वीकार किया। कल्याण सिंह उन 13 लोगों में शामिल रहे जिन पर मूल आरोपपत्र में बाबरी मस्जिद  के ढांचे को गिराने की ‘साजिश’ में शामिल होने का आरोप लगा। उनके खिलाफ आरोपगत पेशबंदी यह थी कि 1991 में  मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कल्याण सिंह ने मुरली मनोहर जोशी और दूसरे नेताओं के साथ अयोध्या जाकर शपथ ली थी कि विवादित जगह पर ही मंदिर बनेगा। अक्टूबर, 1991 में उनकी सरकार ने बाबरी मस्जिद कॉम्प्लेक्स के पास 2.77 एकड़ जमीन का अधिग्रहण पर्यटन प्रोत्साहन के नाम पर किया।

राम के लिये सत्ता का त्याग करने वाले विरले नेता थे कल्याण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद अयोध्या में भमिपूजन किया था लेकिन कल्याण सिंह की सरकार में जुलाई, 1992 में संघ परिवार ने प्रस्तावित राम मंदिर का शिलान्यास कर दिया था और बाबरी मस्जिद के इर्द-गिर्द खुदाई कर वहां सीमेंट-कंक्रीट की 10 फुट मोटी परत भर दी थी। यह और बात है कि बतौर मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इसे भजन करने का स्थान बताया जबकि विश्व हिंदू परिषद ने इसे राम मंदिर की बुनियाद करार दिया था। 6 दिसंबर की कारसेवा को देखते हुए केंद्र सरकार ने 195 कंपनी केंद्रीय सैन्य  बल कल्याण सरकार की मदद के लिए भेज दिया था ,लेकिन कल्याण सिंह सरकार ने उसका इस्तेमाल नहीं किया। 5 दिसंबर को उत्तर प्रदेश यूपी के प्रमुख गृह सचिव  ने केंद्रीय बल का प्रयोग करने का सुझाव दिया, लेकिन कल्याण सहमत नहीं हुए।

कल्याण सिंह का जन्म 5 जनवरी 1932 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के एक छोटे से गांव माधोली में हुआ था।  कल्याण सिंह से अपनी प्रारंभिक शिक्षा अलीगढ़ से ही पूरी की और स्थानीय महाविद्यालय से बीए की डिग्री हासिल की। कल्याण सिंह की सियासी पारी वर्ष 1967 में शुरू हुई थी, जब वे पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा सदस्य के लिए चुने गए और वर्ष 1980 तक विधायक रहे। उसके बाद जून 1991 में भाजपा की शानदार जीत के बाद पार्टी ने उन्हें उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। बाबरी विध्वंस के बाद कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया था लेकिन 1997 में एक बार फिर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने। बाबरी मस्जिद विध्वंस में उन्हें भी घसीटा गया। कल्याण सिंह अपने राजनीतिक जीवन में अटल बिहारी वाजपेयी को हमेशा आदर्श मानते रहे, लेकिन राजनीतिक जीवन में एक बार ऐसा समय भी आया जब कल्याण सिंह ने अटल बिहारी वाजपेयी से नाराज होकर भाजपा से नाता तोड़ लिया था और नई राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बना ली थी। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के अनुरोध पर ही वे भाजपा में वापस आ गए थे लेकिन साल 2009 में फिर भाजपा से अलग होकर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे लेकिन साल 2013 में फिर भाजपा में शामिल हो गए। मोदी सरकार के आने के बाद कल्याण सिंह को राजस्थान और हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। कल्याण सिंह राष्ट्रीय सेवक संघ के पूर्णकालिक सदस्य के रूप  1975 में आपातकाल के दौरान 21 माह तक जेल में बंद रहे।

मुख्यमंत्री बनने पर स्कूलों में भारत माता की प्रार्थना और वंदे मातरम को अनिवार्य कर दिया था। वर्ष 1991 में यूपी में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और पहले शिक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नकल अध्यादेश जारी  किया था। इस कानून में कक्ष निरीक्षकों को भी जेल भेजने का प्रावधान किया गया था। वे इसके विरोध की परिणिति से भी पूर्व परिचित थे लेकिन उन्हें पता था कि सुधार—परिष्कार के लिए कड़े फैसले जरूरी होते हैं।

कल्याण सिंह ने अपने 77वें जन्मदिवस को उत्तर प्रदेश को नयी पार्टी का बिल्कुल नया तोहफा दिया था और उसका अध्यक्ष अपने बेटे राजवीर सिंह को बनाया था। वे दो बार मुलायम सिंह यादव से भी जुड़े लेकिन जिसका मन राम और उसके काम से जुड़ा हो, वह राम विरोधी मुलायम के साथ कितना ताल—मेल बिठा पाते। जिस तरह आज केंद्र में मोदी और उत्तर प्रदेश में योगी की बात होती है, नब्बे के दशक में भी कमोवेश उसी तरह कें हालात थे। केंद्र में अटल और यूपी में कल्याण के नारे लगते थे। 1997 में दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद कल्याण सिंह ने  भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं से पंगा भी लिया। अटल बिहारी वाजपेयी से तो उन्होंने यहां तक कह दिया था कि एमपी बनेंगे तभी तो पीएम  बन पाएंगे। भाजपा में पार्षद रहीं उनकी पारिवारिक मित्र कुसुम राय को लेकर भी वे राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहे। उनके कार्यकाल में कुसुम राय का वर्चस्व सिर चढ़कर बोलता रहा। बाद में कल्याण सिंह और कुसुम राय दोनों ही भाजपा से निकाल दिए गए। यह और बात है कि बाद में कुसुम राय भाजपा से ही राज्यसभा सांसद बनीं। कल्याण भी भाजपा में  लौटकर आए। सांसद का चुनाव लड़े, हारे और फिर पार्टी  से नाता तोड़ लिया।

कल्याण सिंह भाजपा के उन जुझारू और दिग्गज नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने सन 1962 में महज 30 साल की उम्र में जनसंघ से अलीगढ़ की अतरौली सीट से चुनाव लड़ा। पराजित भी हुए लेकिन हार नहीं मानी। पांच साल 1967 में जब फिर चुनाव हुए तो वे  कांग्रेस प्रत्याशी को 4 हजार वोटों से शिकस्त देने में कामयाब रहे। इसके बाद वे अतरौली से 8 बार विधायक  चुने गए। नौंवी बार का चुनाव वे मुस्लिम प्रत्याशी से हारे थे।

कल्याण सिंह का राजनीतिक अभ्युदय उस दौर में हुआ था जब उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह कांग्रेस विरोधी राजनीति का विजय ध्वज लहरा रहे थे। हिंदुस्तान में हरित क्रांति हुई थी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों की स्थिति सुधरी थी। वर्ष 1989-90 में जब देश में मंडल और कमंडल की राजनीति ने जोर पकड़ा था। पिछड़ा वर्ग  में आने वाली जातियों का वर्गीकरण हुआ और पिछड़ा वर्ग की राजनीतिक ताकत पर मुहर लगने लगी तब वणिकों और ब्राह्मणों की पार्टी के रूप में प्रसिद्ध भाजपा ने कल्याण सिंह को पिछड़ा वर्ग का चेहरा बनाया था। कल्याण सिंह की  जहां  हिंदू हृदय सम्राट  की छवि बन रही थी, वहीं वे लोधी राजपूतों के मुखिया के तौर पर भी उभर रहे थे। कल्याण की जिंदगी में एक दौर वह भी आया जब प्रदेश में दो मुख्यमंत्री बन गए। और दोनों ही पदभार संभाल लिया लेकिन तब भी अंबिका चौधरी को अदालती पटखनी देकर कल्याण सिंह वीर नायक की भूमिका में उभर कर सामने आए। कल्याण सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और अयोध्या में भूमिपूजन के दौर में कहा था कि उनकी दिली इच्छा है कि राम मंदिर का निर्माण मैं अपनी इन आंखों से देख सकूं। उनकी वह मनारेरथ तो नहीं पूर्ण हो सके लेकिन राममंदिर निर्माण की दिशा में किए गए उनके राजनीतिक प्रयासों को यह देश हमेशा याद रखेगा। जब भी लोग अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन करेंगे, सरयू में गोते लगाएंगे, उन्हें कल्याण सिंह बहुत याद आएंगे

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