उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। इसी बीच ब्राह्मण वोट (Brahmin Vote) को लेकर बीजेपी (BJP) और समाजवादी पार्टी (SP) आमने-सामने आ गई हैं। अखिलेश यादव के ‘PDA में पंडित भी शामिल हैं’ वाले बयान के बाद शुरू हुई सियासी बहस अब आरोप-प्रत्यारोप तक पहुंच गई है।
अखिलेश यादव के बयान पर डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने पलटवार करते हुए कहा कि किसी समाज का विकास केवल एक परिवार को सत्ता में पहुंचाने से नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि विकास के लिए सभी वर्गों को बराबर अवसर, न्याय और सम्मान मिलना जरूरी है।
‘अखिलेश ब्राह्मणों के लिए बोलें तो दिक्कत क्यों?’
बीजेपी के हमले के बाद समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक संतोष पांडेय ने ब्रजेश पाठक को घेरा। उन्होंने कहा कि अगर अखिलेश यादव ब्राह्मण समाज के लिए कुछ बोल रहे हैं तो इसमें बीजेपी को आपत्ति क्यों हो रही है?
संतोष पांडेय ने दावा किया कि ब्राह्मण समाज उपमुख्यमंत्री से उम्मीद लगाए हुए है। उन्होंने आरोप लगाया कि ब्रजेश पाठक समाज के सवालों का जवाब देने के बजाय अखिलेश यादव पर हमला कर रहे हैं।
सपा ने पुराने मुद्दों से घेरा
संतोष पांडेय ने अपने पलटवार में कई पुराने और संवेदनशील मामलों का जिक्र किया। उन्होंने शंकराचार्य, विजय मिश्रा, खुशी दुबे, डॉक्टर घनश्याम त्रिपाठी और कबीर तिवारी से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए ब्रजेश पाठक से जवाब मांगा।
सपा नेता ने सवाल किया कि अगर बीजेपी खुद को ब्राह्मण समाज का हितैषी बताती है तो उसे इन मुद्दों पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
क्या बदल रहा है सपा का सामाजिक समीकरण?
अखिलेश यादव के ‘PDA में पंडित’ वाले बयान को सपा की रणनीति में बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी अब 2027 की तैयारियों में जुटी है और अलग-अलग सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है।
ब्राह्मण समाज को लेकर सपा की सक्रियता बीजेपी के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यह वर्ग उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली भूमिका निभाता रहा है।
चुनाव से पहले बढ़ेगा सियासी तापमान
अभी विधानसभा चुनाव में समय है, लेकिन बीजेपी और सपा के बीच जिस तरह ब्राह्मण वोट को लेकर बयानबाजी शुरू हुई है, उससे साफ है कि सामाजिक समीकरणों की लड़ाई जल्द तेज होने वाली है।
एक तरफ बीजेपी अखिलेश यादव के बयान को चुनावी मजबूरी बता रही है, तो दूसरी तरफ सपा सरकार और बीजेपी नेतृत्व से ब्राह्मण समाज से जुड़े मुद्दों पर जवाब मांग रही है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि ब्राह्मण वोट को लेकर चल रही यह जुबानी जंग किस तरह के राजनीतिक समीकरण में बदलती है।









