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उत्तर भारत में जल-प्रलय! बाढ़ ने हिमाचल-पंजाब-जम्मू में मचाई तबाही

Writer D by Writer D
03/09/2025
in Main Slider, पंजाब
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Floods wreak havoc in North India

Floods wreak havoc in North India

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उत्तर भारत में जहां नजर घुमाइए सिर्फ और सिर्फ पानी नजर आ रहा। यहां नदियां उफान पर हैं और बादल फटने की घटनाएं बढ़ रही हैं। पानी के प्रकोप से लोग हैरान और परेशान हैं। मदद की आस लगाए बैठे हैं। किसी ने भी नहीं सोचा था कि हर साल बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में तबाही मचाने वाली बाढ़ (Flood) इस बार पंजाब, हिमाचल और जम्मू में ऐसा रौद्र रूप अपनाएगी।

मौसम विभाग (IMD) ने अगस्त के अंत में केवल 72 घंटों में 300-350 मिमी बारिश दर्ज की, जो इस अवधि के औसत से लगभग तीन गुना ज्यादा है। अधिकारियों और मौसम वैज्ञानिकों ने इसे चार दशकों से भी ज्यादा समय में उत्तर भारत में आई सबसे भीषण बाढ़ (Flood) बताया है।

रौद्र रूप में नदियां

इस जलप्रलय में 1988 की पंजाब की विनाशकारी बाढ़ (Flood) की गूंज है। जब सिंधु जल प्रणाली की उफनती नदियों ने बड़े पैमाने पर कृषि भूमि और कस्बों को जलमग्न कर दिया था। लेकिन इस बार, प्रकृति का प्रकोप जलवायु परिवर्तन, बेतरतीब शहरीकरण और चरमराते बुनियादी ढांचे के संयुक्त प्रभावों से और भी बढ़ गया।

इस बार भी सिंधु, रावी, सतलज, झेलम, चिनाब और व्यास नदियों वाली सिंधु नदी प्रणाली उफान पर आ गई। इसका सबसे पहला खतरा हिमाचल प्रदेश को झेलना पड़ा। लगातार बादल फटने के कारण कुल्लू, मंडी और किन्नौर जिले की खड़ी ढलानें ढह गईं और चट्टानें और मलबा नदी घाटियों में गिरने लगा।

व्यास और सतलज नदियों ने कई हिस्सों में तटबंधों को तोड़ दिया। चंडीगढ़-मनाली राजमार्ग के कुछ हिस्सों सहित 250 से ज्यादा सड़कें बह गईं। विशाल नाथपा झाकड़ी जलविद्युत संयंत्र सहित सतलज पर स्थित बिजली परियोजनाओं को बंद करने पड़े। शिमला और कुल्लू के सेब के बाग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। यहां की सालाना उपज लगभग 5 हजार करोड़ रुपये होती है।

हिमाचल प्रदेश के अधिकारियों का अनुमान है कि 10,000 हेक्टेयर से ज्यादा बागवानी जमीन बर्बाद हो गई है, जिससे किसानों की आय कम से कम दो सीजन पीछे चली गई है। 31 अगस्त तक, हिमाचल प्रदेश में 220 से ज्यादा मौतें और 12,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति का नुकसान दर्ज किया गया था।

जम्मू में ढह गए पुल

जम्मू में चिनाब और झेलम नदी खतरनाक रूप से बढ़ गईं। राजौरी और पुंछ में पुल माचिस की तीलियों की तरह ढह गए, जिससे गांव अलग-थलग पड़ गए। श्रीनगर में झेलम नदी के खतरे के निशान की ओर बढ़ते देख लोगों की 2014 की भयावहता याद आ गई, जब नदी ने हफ्तों तक शहर को जलमग्न कर दिया था। हालांकि इस बार तटबंध मजबूत रहे, फिर भी हजारों लोगों को वहां से निकालना पड़ा।

जम्मू और कश्मीर में लगभग 40,000 घर और 90,000 हेक्टेयर खड़ी धान की फसल नष्ट हो गई। सरकारी अनुमान के मुताबिक, 6,500 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है।

पंजाब का भी बुरा हाल

तबाही का सबसे बड़ा मंजर पंजाब में देखने को मिला। भाखड़ा नांगल डैम से अतिरिक्त पानी छोड़े जाने से सतलुज नदी उफान पर है। रोपड़, लुधियाना, जालंधर और फिरोजपुर पानी-पानी हो गया। घग्गर और रावी नदियों ने इस मुसीबत को और बढ़ा दिया। 30 अगस्त तक, 1,800 से ज्यादा गांव जलमग्न हो गए थे। 2,50,000 हेक्टेयर कृषि भूमि जलमग्न हो गई और अनुमानित 9,000 करोड़ रुपये की फसलें बर्बाद हो गई।

क्यों पैदा हुए ऐसे हालात?

इस बाढ़ को विशेष रूप से विनाशकारी बनाने वाली बात यह है कि इसका सिंधु नदी प्रणाली के साथ अलाइनमेंट। इसकी सहायक नदियां व्यास, सतलुज, रावी, चिनाब और झेलम हिमाचल, पंजाब और जम्मू की जीवनरेखाएं हैं। 1960 में पाकिस्तान के साथ हुई सिंधु जल संधि इन नदियों की स्थिरता और पूर्वानुमान पर आधारित थी। लेकिन जलवायु परिवर्तन इन मान्यताओं को उलट रहा है ग्लेशियर का पिघलना, अनियमित मानसून और बादल फटना नदियों के प्रवाह को ऐसे तरीके से बदल रहे हैं जिसकी संधि को बनाने वालों ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। अगस्त में आई बाढ़ ने बता दिया कि उत्तर भारतीय मैदानी इलाके भाखड़ा, पौंग और रंजीत सागर जैसे बांधों के अनुशासित प्रबंधन पर कितनी अधिक निर्भर हैं। जब वर्षा जल-प्रवाह क्षमता से अधिक हो जाती है तो संतुलन कितनी जल्दी बिगड़ जाता है।

मौसम वैज्ञानिक इस साल की बाढ़ के बड़े पैमाने के पीछे कई कारकों की ओर इशारा करते हैं। उत्तर भारत में रुके हुए मानसून ने बंगाल की खाड़ी से नमी से भरी हवाओं का एक कन्वेयर बेल्ट बनाया, जबकि वेस्टर्न डिस्टरबेंस ने इस प्रणाली में नई ऊर्जा का संचार किया। इसका नतीजा यह हुआ कि पहाड़ों में बादल फटे और मैदानी इलाकों में मूसलाधार बारिश हुई, जिससे पहले से ही ग्लेशियरों के पिघलने से उफन रही नदियां और भी ज़्यादा उफान पर आ गईं।

50 साल में एक बार होती थीं ऐसी घटनाएं

जलवायु वैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसी घटनाएं 50 साल में एक बार होती थीं, लेकिन अब लगातार बढ़ती जा रही हैं। हिमालय, वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी गति से गर्म हो रहा है। तेजी से बर्फ पिघल रही है, जिससे बाढ़ का ख़तरा बढ़ रहा है। साथ ही, वनों की कटाई, खनन और नदी तटों और बाढ़ के मैदानों पर बेतहाशा निर्माण ने धरती के प्राकृतिक आघात अवशोषक को नष्ट कर दिया है।

शहरीकरण ने संकट को और बढ़ा दिया

शहरीकरण ने संकट को और बढ़ा दिया है। हिमाचल प्रदेश में नदी के किनारे बने होटल और घर सबसे पहले ढह गए। पंजाब में जल निकासी मार्गों पर वर्षों से अतिक्रमण के कारण वर्षा जल का कोई ठिकाना नहीं था। विशेषज्ञों का कहना है कि पंजाब के नालों का 3,200 किलोमीटर लंबा जाल जो कभी राज्य का सुरक्षा कवच था गाद और अवैध निर्माण से अवरुद्ध हो गया है। जम्मू में, झेलम के बाढ़ के मैदान बस्तियों के कारण लगातार संकरे होते जा रहे हैं, जिससे नदी के लिए सांस लेने की जगह बहुत कम रह गई है। इसका नतीजा यह है कि एक ऐसा परिदृश्य तैयार है जो आपदा के लिए तैयार है, जहां एक हफ़्ते की ज़्यादा बारिश करोड़ों डॉलर के नुकसान का कारण बनती है।

Tags: flood i punjabflood in himachalflood in jammu
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